अधूरी चिट्ठियाँ – भाग 1: नीला लिफ़ाफ़ा
नेहा ने तीन साल बाद पुरानी अलमारी खोली तो सबसे ऊपर वही नीला लिफ़ाफ़ा रखा मिला। उस पर न टिकट था, न कोई पता। बस एक नाम लिखा था—आरव।
वह उसे हाथ में लिए देर तक खड़ी रही। बाहर लखनऊ की शाम धीरे-धीरे उतर रही थी और रसोई से चाय की भाप कमरे तक आ रही थी। पैंतीस की उम्र में भी कुछ चीज़ें इतनी ही आसानी से दिल को पकड़ लेती हैं, जैसे कल की ही बात हो।
तीन साल पहले आरव का तबादला दिल्ली हो गया था। दोनों ने तय किया था कि दूरी से कुछ नहीं बदलेगा। फ़ोन पर बातें होती रहीं, फिर कम होती गईं, और फिर एक दिन बस ख़ामोशी रह गई। न कोई झगड़ा हुआ, न कोई वादा टूटा। बस दोनों थक गए थे, शायद एक-दूसरे का इंतज़ार करते-करते।
नेहा ने लिफ़ाफ़ा खोला। भीतर एक पन्ना था, जिस पर आधी-अधूरी पंक्तियाँ लिखी थीं। उसने लिखना शुरू तो किया था, पर भेजने की हिम्मत कभी नहीं जुटा पाई थी।
उस रात उसने नया काग़ज़ उठाया और पहली पंक्ति लिखी: “आरव, कैसे हो? मैं ठीक हूँ, या शायद ठीक होने की कोशिश में हूँ।”
(कहानी अगले भाग में जारी है)