चाय की आख़िरी चुस्की
शादी को दस साल हो चुके थे और रोहन-सिया की ज़िंदगी एक तयशुदा लय में चल रही थी: सुबह की भागदौड़, दिन भर के काम, रात का थका हुआ खाना। बातें होती थीं, पर ज़्यादातर बिलों, बच्चों के स्कूल और अगले हफ़्ते की योजनाओं के बारे में।
उस रविवार शाम अचानक बिजली चली गई। सिया ने मोमबत्ती जलाई और रोहन से कहा, “चलो छत पर चलते हैं।” रोहन को हैरानी हुई, क्योंकि पिछली बार वे छत पर कब गए थे, यह उसे याद ही नहीं था।
सिया ने दो कप चाय बनाई। ठंडी हवा चल रही थी, और आसमान में पहला तारा झाँक रहा था। दोनों काफ़ी देर तक चुप बैठे रहे, पर यह चुप्पी बोझ नहीं थी। इसमें एक पुरानी पहचान की गरमाहट थी।
“याद है,” रोहन ने कहा, “शादी के पहले साल हम इसी छत पर बारिश में भीगे थे?” सिया मुस्कुराई। “और तुमने कहा था कि मैं हमेशा तुम्हारी चाय में चीनी ज़्यादा डालती हूँ।”
दोनों हँस पड़े। रोहन ने उसका हाथ थाम लिया और बिना कुछ कहे अपनी चाय की आख़िरी चुस्की ली। उस शाम उन्हें समझ आया कि रिश्ते को बचाने के लिए बड़े वादे नहीं, बस थोड़ा-सा वक़्त चाहिए होता है, और साथ बैठने की नीयत।