अधूरी चिट्ठियाँ – भाग 2: दिल्ली से जवाब
आरव को वह चिट्ठी पूरे नौ दिन बाद मिली। दिल्ली के पुराने पते पर, जहाँ वह अब रहता भी नहीं था। मकान-मालकिन ने उसे एक पड़ोसी के हाथ भिजवाया था, और पड़ोसी ने हफ़्ते भर उसे अपनी मेज़ पर रखे रखा।
उस शाम दिल्ली में बारिश हो रही थी। आरव भीगता हुआ घर पहुँचा, गीले हाथ पोंछे और लिफ़ाफ़ा खोला। नेहा की लिखावट देखते ही उसे लगा जैसे बरसों से बंद कोई खिड़की अचानक खुल गई हो।
उसने चिट्ठी दो बार पढ़ी। फिर तीसरी बार, धीमे-धीमे, हर शब्द पर रुकते हुए। उसमें कोई शिकायत नहीं थी, कोई सफ़ाई भी नहीं। बस इतना था कि यादें अब भी साथ हैं, और शायद कुछ बातें कहने से रह गई थीं।
आरव के पास जवाब के लिए शब्द नहीं थे, पर चुप रहना अब उसे मंज़ूर नहीं था। उसने लिखा: “मैं भी ठीक होने की कोशिश में हूँ। क्या तुम्हें याद है, हम स्टेशन पर आख़िरी बार कब मिले थे?”
चिट्ठी डाकखाने में डालकर वह देर तक बारिश को देखता रहा। इस बार उसे जवाब का इंतज़ार डरावना नहीं लग रहा था।
(कहानी अगले भाग में जारी है)