शीशे का शहर
इरा जिस शहर में पहुँची, वहाँ की हर इमारत शीशे की थी। सड़कें चमकती थीं, दीवारों में आसमान उतर आता था, और लोग चलते हुए अपने ही प्रतिबिंब से बातें करते थे।
उसे जल्दी समझ आ गया कि यहाँ का नियम अजीब है। हर इंसान को शीशे में वही दिखता था जो वह देखना चाहता था: सफल, सुंदर और संतुष्ट। किसी ने कभी अपनी असली शक्ल नहीं देखी थी।
एक बूढ़े दुकानदार ने इरा से कहा, “यहाँ सब ख़ुश हैं, क्योंकि यहाँ सच दिखता ही नहीं।” इरा ने पूछा, “तो आप ख़ुश हैं?” दुकानदार देर तक चुप रहा और फिर धीमे से बोला, “मैंने बरसों से किसी की आँखों में नहीं देखा।”
इरा ने अपने बैग से एक छोटा, पुराना, धुँधला काँच निकाला, जो उसकी दादी ने दिया था। उसमें न कोई चमक थी, न झूठ। दुकानदार ने उसमें झाँका और पहली बार अपना असली चेहरा देखा: झुर्रियाँ, थकान, और आँखों में दबी हुई एक पुरानी उम्मीद।
उसने काँपती आवाज़ में कहा, “बहुत दिनों बाद ख़ुद से मुलाक़ात हुई है।” उस शाम शहर की एक खिड़की पर पहली बार धूल दिखी, और इरा को लगा कि बदलाव ऐसे ही शुरू होता है।