पुराने स्टेशन की शाम
क़स्बे के पुराने स्टेशन पर अब गिनती की गाड़ियाँ रुकती थीं। फिर भी मृदुल हर शाम छह बजे वहीं पहुँच जाता और आख़िरी बेंच पर बैठकर आती-जाती ट्रेनें देखता रहता।
लोग समझते थे कि उसे ट्रेनों का शौक़ है। सच यह था कि चौदह साल पहले इसी प्लेटफ़ॉर्म से अनन्या गई थी, और जाते वक़्त कहा था, “अगर क़िस्मत में हुआ तो लौटूँगी।” मृदुल ने तब से न शादी की, न इंतज़ार छोड़ा।
उस शाम हल्की बारिश हो रही थी। एक महिला छाता लिए उसकी बेंच के पास आकर रुकी और बोली, “क्या मैं यहाँ बैठ सकती हूँ?” मृदुल ने सिर उठाया तो एक पल को समय ठहर गया।
वह अनन्या थी। बाल थोड़े सफ़ेद, आँखों में थकान, पर आवाज़ वही। उसने कहा, “मैं लौट नहीं पाई, मृदुल। लौटने की हिम्मत ही नहीं हुई।”
मृदुल ने कोई सवाल नहीं किया। उसने बस बेंच पर थोड़ी जगह बना दी। बारिश की बूँदें टिन की छत पर बजती रहीं, और पुराने स्टेशन ने बहुत दिनों बाद दो लोगों को साथ बैठे देखा।