दो खिड़कियाँ

लेखक: Desi Garam Kahani श्रेणी: रिश्तों पर आधारित कहानियाँ 2 मिनट पढ़ना प्रकाशित:

20 पिक्सल

पहली रोशनी

मुंबई की उस तंग गली में दो इमारतें इतनी पास थीं कि एक की खिड़की से दूसरी का पर्दा हिलता दिख जाता था। तीसरी मंज़िल पर कविता रहती थी और ठीक सामने, उतनी ही ऊँचाई पर, समीर।

दोनों अकेले थे और दोनों देर रात तक जागते थे। इस शहर में पड़ोसी एक-दूसरे का नाम नहीं जानते, इसलिए उन्होंने भी कभी बात करने की कोशिश नहीं की। बस शाम होते ही दोनों की बत्तियाँ लगभग एक साथ जल जातीं।

बिना बोले बातचीत

एक रात कविता की बत्ती नहीं जली। समीर देर तक अपनी खिड़की पर खड़ा रहा और उसे अजीब-सी बेचैनी हुई। अगली शाम बत्ती जली तो उसने राहत की साँस ली और पहली बार हाथ हिलाकर अभिवादन किया।

कविता चौंकी, फिर मुस्कुराई और उसने भी हाथ हिला दिया। उस दिन के बाद यह रोज़ का सिलसिला बन गया: दो हाथ, दो खिड़कियाँ, और बिना शब्दों की एक पूरी बातचीत।

सीढ़ियों पर मुलाक़ात

महीनों बाद कविता ने काग़ज़ पर लिखकर खिड़की से दिखाया: “कल रविवार है। नीचे चाय?” समीर ने अँगूठा उठाकर हामी भरी।

अगली सुबह दोनों गली के नुक्कड़ वाली टपरी पर मिले। पहली बार आमने-सामने खड़े होकर दोनों थोड़ा झेंपे, फिर हँस पड़े। चाय के पहले घूँट के साथ समीर ने कहा, “इतने दिन खिड़की से देखा, आज पहली बार लग रहा है कि तुम सचमुच हो।”

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